ना मकान का पता है,
ना शहर की खबर है,
हमें क्या पता के हम क्या ढूंडते हैं..
एक सदा आ रही है दिल से, ये धीरे धीरे,
के क्यूँ हम खुद में ये सारा जहाँ ढूडते हैं|
हमें क्या पता के हम क्या ढूंडते हैं....
ना माझी ना लहरों का पता है,
ना बारिश न सूरज की किरणों की खबर है,
फूलों ने रंगों से है दुनिया सजाई...
हर एक मौसम में खुशियाँ तमाम ढूंडते हैं|
नाराज़ हमीसे हम हैं शायद,
कुछ कहते नहीं हैं,
हर आवाज़ से बोलना चाहते हैं|
चाहते हैं कोई मना ले हमे,
न जाने क्यूँ ये इनायत चाहते हैं.
खुद में ही न खो जाएँ हम ये डर है,
इसलिए हर एक आईने में अपना सब्ब ढूंडते हैं|
हमें क्या पता के हम क्या ढूंडते हैं....
एक सदा आ रही है दिल से, ये धीरे धीरे,
के क्यूँ हम खुद में ये सारा जहाँ ढूडते हैं.
हमें क्या पता के हम क्या ढूंडते हैं....
ना शहर की खबर है,
हमें क्या पता के हम क्या ढूंडते हैं..
एक सदा आ रही है दिल से, ये धीरे धीरे,
के क्यूँ हम खुद में ये सारा जहाँ ढूडते हैं|
हमें क्या पता के हम क्या ढूंडते हैं....
ना माझी ना लहरों का पता है,
ना बारिश न सूरज की किरणों की खबर है,
फूलों ने रंगों से है दुनिया सजाई...
हर एक मौसम में खुशियाँ तमाम ढूंडते हैं|
नाराज़ हमीसे हम हैं शायद,
कुछ कहते नहीं हैं,
हर आवाज़ से बोलना चाहते हैं|
चाहते हैं कोई मना ले हमे,
न जाने क्यूँ ये इनायत चाहते हैं.
खुद में ही न खो जाएँ हम ये डर है,
इसलिए हर एक आईने में अपना सब्ब ढूंडते हैं|
हमें क्या पता के हम क्या ढूंडते हैं....
एक सदा आ रही है दिल से, ये धीरे धीरे,
के क्यूँ हम खुद में ये सारा जहाँ ढूडते हैं.
हमें क्या पता के हम क्या ढूंडते हैं....