Saturday, June 27, 2009

ज़िन्दगी के रूप

And this is the continuation to the "Uncleashing of the past", this the first poem I wrote...its a very abstract kind of a thought..put in to words...hope u all like it...enjoy!!!

ज़िन्दगी तेरे रूप हैं अनेक,
कभी सुखों का डेरा तो कभी दुःख,
पर कोई कर नहीं सकता इन्हें एक
और बन जाते हैं इन पर लेख|

थक गए हैं ज़िन्दगी की बाग़-डोर से,
अब क्या करें इसका इलाज,
जल्द करो कोई उपाय इसका, जिससे,
हो जाये हाँ सबका इलाज|

रुक जाये अगर ये दुनिया का कारवां,
हो जाये सबका सर्वनाश,
ज़िन्दगी के धर्म कर्मो को न भोगना यहाँ,
आ जाये सर्वनाश के बाद निर्माण का प्रकाश|

हो गयी है अब ज़िन्दगी पूरी क्या करें,
मुश्किलों के झंझटों से अब छुटे,
ज़िन्दगी की भीड़-भ्बबअड़ से परे तो क्या करें,
ज़िन्दगी के रूपों से भी अभी छुटे|

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